Diwali Kyu Manaya Jata Hai | दीपावली कब और क्यों मनाई जाती है | दीपावली पर निबंध

 हमारे भारत में वैसे तो अनेकों पर्व मनाया जाते हैं, जिसमें से कुछ ऐसे भी पर्व है, जो कि भारतीय इतिहास में अपना विशेष महत्व रखते हैं। भारत में मनाए जाने वाले इन सभी धार्मिक त्योहारों की सूची में सबसे ऊपर दशहरा और दिवाली आता है। हिन्दू धर्म में दिवाली सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है।

दीपावली भारत के कुछ सबसे बड़े त्योहारों में गिना जाता है। कार्तिक मास के अमावस्या को पड़ने वाले इस त्योहार को पूरी दुनिया में लोग बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हर साल कार्तिक मास की अमावस्या पर पड़ने वाले दीपावली को मनाए जाने के कई कारण हैं। इस दिन सिर्फ दीयों को जलाने और खुशियों को बांटने की प्रथा नहीं है बल्कि दीपावली को मनाने के पीछे कई कारण हैं जिनसे बहुत से लोग अनजान हैं।  इस लेख को पढ़िए और जानिए क‍ि ना ही सिर्फ हिंदुओं को बल्कि अन्य धर्मों के लोगों को भी क्यों दीपावली मनानी चाहिए।

भारत समेत पूरी दुनिया में  धूमधाम से दिवाली मनाई जाती है। लोगों को इस रोशनी के त्योहार का बेसब्री से इंतजार रहता है। काफी पहले से ही लोग घर की सफाई और दिवाली की शॉपिंग समेत सभी तमाम तैयारियां शुरू कर देते हैं। इस दिन लोग घर में खुशहाली के लिए मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करते हैं। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में कुछ ऐसी जगहें हैं जहां पर दिवाली नहीं मानई जाती हैं।

भारत में दिवाली कहा नहि मनाई जाति है।

भारत में इन जगहों पर लोग न मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करते हैं और न ही पटाखे जलाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां पर लोग दीये भी नहीं जलाते हैं। भारत के दक्षिणी राज्य केरल में दिवाली का त्योहरा नहीं मनाया जाता है। केरल के लोग दिवाली के अलावा सभी त्योहार धूमधाम से मनाते हैं, लेकिन दिवाली पर कुछ नहीं करते हैं। केरल में दिवाली सिर्फ कोच्चि में ही मनाई जाती है।

केरल में क्यों नहीं मनाई जाती है दिवाली

अब आपके मन में सवाल खड़ा हो रहा होगा कि आखिर केरल में दिवाली क्यों नहीं मनाई जाती है। केरल में दिवाली न मनाने की कई वजहें हैं। केरल में राक्षस महाबली राज करता था और यहां पर उसकी ही पूजा की जाती है। इसलिए लोग यहां पर राक्षस की हार पर पूजा नहीं करते हैं।

 केरल में दिवाली न मनाने की दूसरी वजह यह है कि वहां पर हिन्दू धर्म के लोग कम हैं। इस वजह से राज्य में दिवाली पर धूम-धाम नहीं होती। केरल में इस समय बारिश होती है, जिसकी वजह से पटाखे और दीये भी नहीं जलते हैं।

केरल के साथ ही तमिलनाडु में भी एक जगह पर दीवाली नहीं मनाई जाती है। वहां पर लोग नरक चतुर्दर्शी मनाते हुए नजर आते हैं।

दिवाली का यह त्यौहार दशहरे के ठीक 20 दिन बाद आता है। दिवाली भारत में मनाया जाने वाला एक ऐसा त्यौहार है, जिसमें लोग अपने घरों को पूरी तरह से जलते हुए दिए से सजाते हैं, पटाखों के साथ अपने दिवाली के त्यौहार को मनाते हैं। दिवाली मनाने के पीछे बहुत से पौराणिक मान्यताएं हैं

भगवान श्री राम रावण का वध कर लौटे थे अयोध्या

जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं, भगवान श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास हुआ था। भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास अयोध्या की दासी मंथारा के द्वारा माता कैकई का कान भरने के कारण हुआ था। माता कैकई ने मंथारा की बातें सुनकर अपने पति दशरथ से अपने 3 वचनों को मांगा और उन्हें वचनबद्ध कर दिया। माता कैकई के द्वारा दशरथ से मांगे गए वचन निम्न है:

राम को 14 वर्ष का वनवास

14 वर्ष के वनवास के साथ दिया जाए अज्ञातवास भरत को बनाया जाए राजा

माता कैकई द्वारा मांगी गई इन्हीं वचनों के कारण भगवान श्री राम अपने पिता की आज्ञा का मान रखते हुए वन में जाने लगे। तभी उनके साथ उनकी पत्नी सीता ने भी जाने का हठ किया और भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीता को भी अपने साथ लेकर जा रहे थे। तभी उनके छोटे भाई लक्ष्मण ने भी उन लोगों के साथ जाने की अनुमति मांगी, परंतु भगवान श्रीराम नहीं माने। भगवान श्री राम के न मानने पर लक्ष्मण जिद पर अड़ गए और अपने भाई और भाभी के साथ वन चले गए।

वन में जाने के बाद भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण तीनों ही एक कुटिया बनाते हैं और उसी में निवास करने लगते हैं। एक बार लक्ष्मण जंगल में लकड़ियां इकट्ठा कर रहे थे, तब सूप नखा नाम की राक्षसी उनसे विवाह करने का प्रस्ताव लेकर आती है और ज्यादा हठ करने पर लक्ष्मण गुस्सा हो जाते हैं और उसका नाक ही काट देते हैं। वह राक्षसी लक्ष्मण के इस स्वभाव से काफी अपमान महसूस कर रही थी, इसलिए उसने अपने भाई को सारी बातें बताई।

रावण अपनी बहन की इस अपमान का बदला लेने के लिए भगवान श्री राम की पत्नी सीता का हरण करना चाहता है और इसलिए उसने मामा मारीच को स्वर्ण हिरण बनाकर वन में भेज देता है। इसे देखकर माता सीता का मन आकर्षित हो जाता है और वह उस हिरण को अपने पास से देखना चाहती थी, इसलिए उन्होंने राम से उस हिरण को पकड़ने को कहा। भगवान श्रीराम हिरण पकड़ने चले जाते हैं और काफी समय हो जाने के बाद माता सीता चिंतित हो जाती है और लक्ष्मण को भी भेज देती है, तभी वहां पर रावण आकर माता सीता का हरण कर लेता है।

इसके बाद माता सीता की खोज में भगवान श्री राम वानर राज सुग्रीव तक पहुंच जाते हैं और सुग्रीव से उनकी मदद करने का प्रस्ताव रखते हैं। सुग्रीव अपनी वानर की सेना के साथ माता सीता की खोज में लग जाते हैं। सभी नगरों में ढूंढने के बाद भी माता सीता का पता नहीं चलता है और इसके बाद पक्षीराज ने उन्हें बताया कि आपकी पत्नी को रावण ले गया है।

पता चलने के बाद भगवान श्री राम, हनुमान और सुग्रीव के साथ मिलकर रावण के महल पर चढ़ाई कर देते हैं। लंका पहुंचने के बाद कई दिनों के महान युद्ध के बाद रावण का वध हो जाता है। जिस दिन रावण का वध हुआ था, उस दिन को दशहरे के रूप में संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। दशहरे के पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।

रावण के वध के ठीक 20 दिनों बाद भगवान श्री राम अपनी जन्म भूमि अयोध्या लौटे थे। इसीलिए अयोध्या वासियों ने श्री राम के लौटने पर उनका स्वागत घी के दिए जलाकर किया था और तभी से दिवाली का यह त्यौहार मनाया जाता है।

दीपावली के दिन जन्मी थीं माता लक्ष्मी

जैसा कि हमलोग जानते है कि माता लक्ष्मी धन की देवी हैं, हिंदू धर्म और शास्त्रों के अनुसार यह कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक मास की अमावस्या के दिन समुद्र मंथन करते समय मां लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी। इसीलिए दीपावली के दिन माता लक्ष्मी का जन्मदिन मनाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है।

भगवान विष्णु ने बचाया था माता लक्ष्मी को

भगवान विष्णु का पांचवां अवतार वामन अवतार है। हिंदू कथाओं में यह बहुत प्रसिद्ध कथा है जिसमें भगवान विष्णु के वामन अवतार ने माता लक्ष्मी को राजा बाली के गिरफ्त से बचाया था। इसीलिए इस दिन दीपावली को मां लक्ष्मी की पूजा करके श्रद्धा भाव से मनाया जाता है।

कृष्ण ने नरकासुर का किया था वध

जब राक्षस राजा नरकासुर ने तीनों लोकों पर आक्रमण कर दिया था और वहां रहने वाले देवी-देवताओं पर अत्याचार कर रहा था तब श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। उसका वध करके श्री कृष्ण ने 16,000 महिलाओं को उसके कैद से आजाद किया था। इस जीत की खुशी को 2 दिन तक मनाया गया था जिसमें दीपावली का दिन मुख्य है। दिपावली पर्व का दूसरा दिन नरक चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है।

पांडवों की हुई थी वापसी

हिंदू धर्म के एक महाकाव्य महाभारत के अनुसार कार्तिक अमावस्या के ही दिन पांडव 12 साल के वनवास के बाद लौटे थे। उनके आने की खुशी में प्रजा ने उनका स्वागत दीयों को जलाकर किया था।

भगवान राम की हुई थी जीत

हिंदू धर्म के दूसरे महाकाव्य रामायण के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ही भगवान श्री राम माता सीता और अपने भाई लक्ष्मण के साथ लंका पर विजय प्राप्त करके अयोध्या वापस लौटे थे। भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के आने की खुशी में पूरा अयोध्या झूम उठा था और दीयों के प्रकाश से उन तीनों का स्वागत किया गया था। इस दिन को भगवान श्री राम के जीत की खुशी के तौर पर भी मनाया जाता है।

दीपावली के ही दिन विक्रमादित्य का हुआ था राज तिलक

बहु पराक्रमी राजा विक्रमादित्य का राजतिलक दीपावली के दिन ही हुआ था। राजा विक्रमादित्य को उदारता, साहस और वीरता के लिए जाना जाता है।

आर्य समाज के लिए है बेहद खास है यह दिन

भारतीय इतिहास में इस दिन 19वीं सदी के विद्वान महर्षि दयानंद ने आज के ही दिन निर्वाण को प्राप्त किया था। महर्षि दयानंद को हम आर्य समाज के संस्थापक के तौर पर जानते हैं। उन्होंने इंसानियत और भाईचारे को बढ़ावा दिया था।

जैन के लिए है एक विशेष दिन

दीपावली के दिन ही जैन धर्म के संस्थापक महावीर तीर्थंकर ने निर्वाण प्राप्त किया था। एक तपस्वी बनने के लिए उन्होंने अपने शाही जिंदगी और परिवार का त्याग किया था। व्रत और तप को अपनाकर उन्होंने निर्वाण को प्राप्त किया था। यह कहा जाता है कि 43 की उम्र में उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया था और जैन धर्म को विस्तार दिया था।

सिखों के लिए दीपावली का है बहुत महत्व

सिखों के तीसरे गुरु अमर दास ने दीपावली के दिन को एक विशेष दिन का दर्जा दिया था जब सारे सिख उनके पास आकर उनका आशीर्वाद लेते थे। दीपावली के दिन ही 1577 में पंजाब के अमृतसर जिले में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था। दीपावली का दिन सिखों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 1619 में उनके छठवें गुरु हरगोविंद को मुगल शासक जहांगीर ने 52 राजाओं के साथ ग्वालियर किले से आजाद किया था।

दिवाली का महत्व

दिवाली के दिन ही माता लक्ष्मी की पूजा किया जाता है और ऐसा माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति सच्चे मन से दिवाली के दिन माता लक्ष्मी की पूजा करता है तो उसके घर पर धन की कभी भी कमी नहीं होती।
दिवाली का त्यौहार विशेष रुप से बुराई पर अच्छाई की जीत के उपलक्ष में मनाया जाता है।
दिवाली का दिन लोगों को यह याद दिलाता है कि सच्चाई और अच्छाई की हमेशा जीत होती है।
दिवाली के दिन लोग एक दूसरे को उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं और एक-दूसरे को मिठाइयां खिलाकर मुंह मीठा भी करवाते हैं।
दीपावली के दिन लोगों के व्यवहार काफी अच्छे होते हैं और लोगों के बीच प्यार बना रहे, इसलिए लोग एक दूसरे के गले भी लगते हैं।
मान्यताओं के अनुसार दिवाली के दिन पटाखे जलाना बहुत ही शुभ होता है और इन पटाखों की आवाज लोगों की खुशी को दर्शाता है।

साल 2022 में लक्ष्मी पूजन का समय-

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त:18:54:52 से 20:16:07 तक
अवधि :1 घंटे 21 मिनट
प्रदोष काल :17:43:11 से 20:16:07 तक
वृषभ काल :18:54:52 से 20:50:43 तक

दिवाली महानिशीथ काल मुहूर्त

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त :23:40:02 से 24:31:00 तक
अवधि :0 घंटे 50 मिनट
महानिशीथ काल :23:40:02 से 24:31:00 तक
सिंह काल :25:26:25 से 27:44:05 तक

दिवाली शुभ चौघड़िया मुहूर्त

सायंकाल मुहूर्त (अमृत, चल):17:29:35 से 19:18:46 तक
रात्रि मुहूर्त (लाभ):22:29:56 से 24:05:31 तक
रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चल):25:41:06 से 30:27:51 तक

दिवाली पूजन सामग्री लिस्ट-

मां लक्ष्मी की प्रतिमा (कमल के पुष्प पर बैठी हुईं), गणेश जी की तस्वीर या प्रतिमा (गणपति जी की सूंड बांयी ओर होनी चाहिए), कमल का फूल, गुलाब का फूल, पान के पत्ते, रोली, सिंदूर, केसर, अक्षत (साबुत चावल), पूजा की सुपारी, फल, फूल मिष्ठान, दूध, दही, शहद, इत्र, गंगाजल, कलावा, धान का लावा(खील) बताशे, लक्ष्मी जी के समक्ष जलाने के लिए पीतल का दीपक, मिट्टी के दीपक, तेल, शुद्ध घी और रुई की बत्तियां, तांबे या पीतल का कलश, एक पानी वाला नारियल, चांदी के लक्ष्मी गणेश स्वरुप के सिक्के, साफ आटा, लाल या पीले रंग का कपड़ा आसन के लिए, चौकी और पूजा के लिए थाली।

आने वाले पांच सालों में दिवाली की तिथियां-

दिवाली 2023- 12 नवंबर
दिवाली 2024- 1 नवंबर
दिवाली 2025- 21 अक्टूबर
दिवाली 2026- 8 नवंबर
दिवाली 2027- 29 अक्टूबर
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